स्नेहिल बोल, लाख टके के

पुस्तक का नाम

लाख टके के बोल

लेखक

हेमन्त स्नेही

प्रकाशक

बीएफसी पब्लिकेशन्स, लखनऊ

मूल्य

समीक्षक

रंजन कुमार सिंह

पत्रकार जगत जिन्हें हेमन्त अग्रवाल के नाम से जानता है, साहित्य जगत के लिए वही हेमन्त स्नेही हैं। मेरा और उनका संगत पत्रकारिता में तो रहा ही है, साहित्य में भी रहा है। मुझे उनके साथ नवभारत टाइम्स में काम करने का मौका मिला और  उन्होंने मेरे टीवी धारावाहिक तारीख गवाहे है के लिए गीत भी लिखा। अब उनकी लेखनी हिन्दी पाठकों के लिए लाख टके के बोल लेकर आई है। यह उनके गीतों, गीतिकाओं और दोहों का संग्रह है। इनमें पत्रकार की वैचारिक अभिव्यक्ति भी है और कवि की भावाभिव्यक्ति भी। यानी कि इन रचनाओं में पत्रकार की ठसक तो है ही, साहित्यकार की कसक भी है।

उनकी पत्रकार प्रज्ञा समय-काल पर अपनी नजरें गड़ाए रहती है और उनका कवि मन समसामयिक घटनाओं को अपने आँसूओं से सींचता चलता है। उनकी रचनाओं में हमें पीड़ा के भाव के साथ-साथ गर्व का बोध भी देखने को मिल जाता है। करगिल युद्ध को यादकर उनकी कलम हुंकार उठती है, दुश्मन का दिल दहला देती, दिन में सौ-सौ बार, गूंज रही सीमा पर अब तक करगिल की हुंकार। देश के दुश्मनों से रू-ब-रू होकर वह लिख पड़ते हैं, हम अहिंसा के पुजारी हैं मगर अवसर पड़े तो शस्त्र लेकर शत्रु का मुख मोड़ना भी जानते हैं। आपातकाल की घोषणा के बाद वह पूछ उठते हैं, हाल क्या है इस चमन का क्या बताइए तो कोविड काल में दुर्बल वर्ग की स्थिति देखकर वह कलप उठते हैं, ये वक्त बहुत ही भारी है, है मजबूरी – लाचारी है। फिर भी उन्हें यह विश्वास बना रहता है कि निश्चय ही अपनी जय होगी। निर्भया कांड से लेकर दिल्ली के दंगे तक पर उनकी पैनी दृष्टि बनी रहती है।

फिरभी उनकी रचनाएं केवल समसामयिक घटनाओं से आंदोलित नहीं हैं, उनमें प्यार की कहानी लिखने की इच्छा भी है, बन्द कर दो गीत गाने अब घृणा के, बात भूलो युद्ध की, तकरार की, आज नूतन पृष्ठ पर इतिहास के, आओ लिखें मिलकर कहानी प्यार की और स्वयं को जानने की चाह भी है, चाहता हूं मैं स्वयं को जान लूं, और निज सामर्थ्य को पहचान लूं। वह अपनी हदें पहचानते हैं, वीणा जैसा साज नहीं हूं, कोयल की आवाज नहीं हूं। हालांकि वह यह भी जानते हैं, रहता हूं खामोश भले ही, बिलकुल बे-आवाज नहीं हूं। यह सही भी है। तभी तो वह उन तमाम करदाओं की मुखर आवाज हैं, टैक्स अदाकर देखिए हाथ बाँध लाचार, किसे मिलेगी रेवड़ी, यह उनका अधिकार। इसी तरह महंगाई की मार झेल रही जनता का दर्द भी उनके दोहे में छलक जाता है, बिजली झटके दे रही, रोज उछलता तेल, आम आदमी के लिए मुश्किल भरना पेट।

यह शायद संयोग नहीं कि गीत खंड का प्रारंभ सरस्वती की स्तुति से होता है तो दोहा खंड का प्रारंभ गणेश के वंदन से। माँ शारदे को नमन करते हुए वह लिखते हैं, शारदे, तुमको नमन है, वर तुम्हारा दिव्य धन है। इसी तरह गणपति से वह माँगते हैं, विद्यावारिधि, बुद्धिप्रिय, दीजे इतना ज्ञान, मर्यादा-कर्तव्य का रहे सदा ही ध्यान। धरती और जल दोनों के लिए ही वह आभार जताते हैं, धरती कितना दे रही, कभी न मांगे दाम, कभी न उफ करती सदा सहती कष्ट तमाम। और फिर, जल अद्भुत वरदान है, जीवन का आधार, जल बिन रेगिस्तान हो यह पूरा संसार।

कुल मिलाकर स्नेही जी की रचनाएं गेय होने के साथ ही गत्यातमक भी हैं। उनका यह काव्य संकलन प्रभाव तो पैदा करता ही है, आनन्द भी देता है।

4 Responses

  1. बहुत सुंदर सुंदर रचनाएं। मैं हेमंत जी से परिचित नहीं हूं। शायद दिल्ली नवभारत टाइम्स में रहे होंगे। उनके बारे में जानकारी देने के लिए साधुवाद।

  2. सटीक, युक्तिसंगत, साथ ही स्नेहपूर्ण समीक्षा के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद और हार्दिक आभार।

  3. बहुत दिनों बाद साहित्य में मन और भाव की बातें इतने आयामों में पँख पसार रही हैं, देख कर, अनुभव कर बहुत आश्वस्त हुआ मन. तुम्हारी कलम से झरती कोमलता भी जीवन में सुंदरता का अहसास करा रही है.

  4. हार्दिक धन्यवाद प्रिय रंजन जी। आभारी हूं। 🙏🙏

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