कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह के नाटक

नाट्य परंपारा की दृष्टि से कुँवर साहब भारतेन्दु या भिखारी ठाकुर की परंपरा में न होकर सीधे-सीधे प्रसाद की परंपरा में दिखाई देते हैं। उनके नाटकों का विषय और उसकी भाषा दोनों ही उन्हें छायावाद से जोड़ती है।