किसी पटकथा से कम नहीं हैं ये नाटक

पुस्तक

कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह ग्रंथावली 4

संपादक

शिवमोहन सिंह

प्रकाशक

लोकभारती प्रकाशन

मूल्य

Rs 4800 (सम्पूर्ण ग्रंथावली)

समीक्षक

रंजन कुमार सिंह

कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह जी से मैं मिला नहीं हूं, पर मैं उन्हें बखूबी जानता हूं। यही नहीं, उनके अधूरे कार्य को पूरा करने का सौभाग्य मुझे मिला, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं।

कुँवर साहब ने 1980 में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी समिति, अमेरिका की स्थापना की थी। इसके पांच साल बाद यानी 1985 में मैं उनके सुपुत्र श्री रविप्रकाश सिंह के आमंत्रण पर अमेरिका गया और समिति के विस्तार में मैंने अपनी भूमिका का निर्वाह किया। 1985 तक जो समिति अमेरिका के वाशिंगटन तथा बाल्टिमोर तक सीमित थी, वह मेरे वहां रहते 22 प्रांतो तक जा पसरी और अमेरिका तथा कनाडा के 28 शहरों में हमने पहली बार वृहद पैमाने पर कवि सम्मेलन श्रृंखला का समायोजन किया। इस तरह मेरा और कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह जी का संबंध कार्य-कारण से बंध गया।

कुँवर साहब ने अमेरिका में हिन्दी का परचम तो लहराया ही, उन्होंने अपनी लेखनी से हिन्दी भाषा एवं साहित्य को बेहद समृद्ध भी किया है। छायावाद की जिस परंपरा को निराला, प्रसाद, पंत तथा महादेवी ने आधार एवं विस्तार दिया, उसकी श्रीवृद्धि में कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह का भी योगदान रहा है। उन्होंने ढेरों कविताएं लिखीं हैं। उनमें बहुत-सी फुटकर रचनाएं शामिल हैं और अनेकों प्रबंध काव्य भी। कवि के तौर पर उनके अवदानों की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, शायद हुई नहीं। पर नाटककार के तौर पर उनका परिचय तो और भी अधूरा है।

यह महज संयोग नहीं कि चन्द्र प्रकाश सिंह जी का मूल अध्ययन नाटकों पर केन्द्रित रहा है। उनका शोध प्रबंध नाटकों पर ही है। ऐसे में, वह न केवल नाटकों की समृद्ध परंपरा से अवगत रहे, बल्कि नाटकों के मूल तत्वों को जानने-समझने तथा उनके गुण-दोष को देखने-परखने का भी उन्हें अवसर मिला। यह सभी खूबियां स्वयं उनके नाटकों में दिखाई देती हैं। नाट्य परंपारा की दृष्टि से कुँवर साहब भारतेन्दु या भिखारी ठाकुर की परंपरा में न होकर सीधे-सीधे प्रसाद की परंपरा में दिखाई देते हैं। उनके नाटकों का विषय और उसकी भाषा दोनों ही उन्हें छायावाद से जोड़ती है। उनमें समस्या का समाधान या आम जनजीवन का बोध न होकर ऱाष्ट्रीयता का उत्कर्ष भाव है।

प्रसाद जहां स्कंदगुप्त, चन्द्रगुप्त या ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से राष्ट्रीय बोध को जागृत करते रहे, वहीं कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह ने सम्राटों के चरित्र को अपने नाटकों की विषयवस्तु न बनाकर जगनिक, तुलसीदास, नरोत्तमदास जैसे साहित्यकारों के संघर्ष और साधना को प्रतिध्वनि दी। हालांकि उन्होंने अपने नाटकों से काम वही किया, जो प्रसाद अपने नाटकों से करते रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दी में ऐतिहासिक नाटकों की जिस परंपरा का सूत्रपात प्रसाद ने किया था, उसे कुँवर साहब ने अपनी लेखनी से सींचने-संवारने का काम किया। देखा जाए तो दोनों के ही नाटक राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक गौरव का गान हैं।

वैसे कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह ने जयशंकर प्रसाद से एक कदम आगे बढ़कर बच्चों के लिए भी  नाटकों का सृजन किया है। वहां उनके विषय बालकवय बुद्ध, लव, या भरत हैं, जिनका व्यक्तित्व बच्चों के लिए खासा आकर्षक तो है ही, विशेष प्रेरणास्प्रद भी है। इस तरह कुँवर साहब की रचनावली में काव्य से लेकर नाटक तक सम्मिलित हैं। साथ ही साथ, वह वयस्कों से लेकर बालकों तक के लिए सामग्री के साथ-साथ नाटकों, लघु-नाटकों एवं एकांकियों का भी सामुच्य है। उन्होंने जितनी कविताओं का सृजन किया, उससे कुछ कम नाटकों का नहीं किया। तभी तो यदि उनकी कविताएं कुणवर चन्द्प्रकाश सिंह ग्रंथावली के तीन खण्डों में समेटी जा सकी हैं, तो उनके नाटकों के लिए भी दो खण्डों की जरूरत पड़ी है। इनमें से कोई भी खण्ड क्षीण नहीं है, बल्कि सभी चार सौ पृष्ठों के वृहद संग्रह हैं।

कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह ने कुल मिलाकर बच्चों के लिए छह एकांकियां लिखीं। वे हैं – आंजनेय, राजकुमार रघु, वीर बालक लव, वीर बालक भरत, तपस्वी बुद्ध तथा बालक बुद्ध। इसके साथ ही उन्होंने वयस्कों के लिए जो एकांकियां लिखीं, वे हैं – कविकुल गुरु, अग्नि परीक्षा तथा कविधर्म। इनके अलावा उन्होंने स्वातंत्र्य की जननि तथा कविवर नरोत्तम दास नाम से दो लघु नाटक तथा जनकवि जगनिक तथा तुलसीदास के नाम से दो ही पूर्ण नाटकों की रचना भी की है। हालांकि उनके द्वारा रचित नाटकों की श्रृंखला यहीं समाप्त नहीं होती। उन्होंने माँ निषाद, महर्षि वेद व्यास, महाकवि कालिदास, कवि वत्सभट्ट और यशोधर्म, महाकवि चन्द, महाकवि सूर और तुलसीदास, महाकवि रहीम, महाकवि भूषण, महाकवि निराला, आचार्य चाणक्य आदि शीर्षकों से कुछ अन्य लघु एकांकियों, एकांकियौं, एवं लघु नाटकों की रचना की हैं।

कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह ग्रंथावली के प्रधान सम्पादक शिवमोहन सिंह ने ग्रंथावली के चतुर्थ खण्ड में उनके नाटकों तथा उनके नाट्यशिल्प की गहन व्याख्या की है। इसके अलावा द्वारका प्रसाद मिश्र तथा जयदेव सिंह ने क्रमशः जनकवि जगनिक तथा तुलसीदास पर अलग से प्राक्कथन लिखा है। ये सभी उनके नाट्य लेखन पर वृहद प्रकाश डालते हैं। ऐसे में मैं कुछ नया लिखूं, यह मेरा दुराग्राह ही होगा और संभवतः वह पिष्टपेषण भी हो। बहरहाल, उनके नाटकों को पढ़ते हुए मैं उसके शिल्प से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा।

मुझे नहीं मालूम कि उनके नाटकों का कितना मंचन हुआ है, हुआ भी है या नहीं। पर इतना जरूर कह सकता हूं कि वाल्मिकि से लेकर निराला तक, जिन-जिन पर भी उन्होंने नाटक लिखे, उनके चारित्रिक गुणों को जानने तथा युगीन स्थितियों-परिस्थितियों को समझने के लिए इन नाटकों को पढ़ना जरूरी है। कुँवर साहब के नाटकों में प्रकाश एवं ध्वनि तत्वों का जैसा उपयोग किया गया है, वह उन्हें नाटक की भारतीय परंपरा की बजाय पाश्चात्य परंपरा से जोड़ता है। ये तत्व उनके दोनों ही पूर्ण नाटकों, तुलसीदास तथा जनकवि जगनिक में खास तौर पर देखे जा सकते हैं। एक फिल्मकार के नाते मैं कह सकता हूं कि इन प्रयोगों के कारण उनके ये नाटक एक हद तक फिल्मों की पटकथा के समकक्ष जा ठहरते हैं।

जनकवि जगनिक नाटक की शुरुआत में हमारे सामने जो दृश्य और स्वर उभरते हैं, वे सिनेमा की भव्यता का बोध कराते हैं।

पहला दृश्य

स्थान- महोबे के राजप्रसाद का सिंहद्वार

(द्वार के बाहर बहुत बड़ा जन-समूह एकत्र हो रहा है। इस जन-समूह में स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध सभी हैं। सबके मुखों पर चिन्ता और भय के चिन्ह अंकित हैं। बड़ा कोलाहल हो रहा है । “हमारी रक्षा होनी चाहिए”, “हमको बचाओ” का जनरव चारों ओर फैल रहा है। त्रस्त और उत्तेजित भीड़ को बढ़ती हुई देखकर प्रहरीगण शीघ्रता से सिंहद्वार के लौह-कपाट बन्द कर लेते हैं, और सजग होकर खड़े हो जाते हैं। एक प्रहरी भीतर जाकर इस जन-समूह के समवेत होने का वृतान्त कहता है । प्रहरी के साथ एक राजपुरुष सिंहद्वार की खिड़की से बाहर आता है और जन-समूह के निकट जाता है ।)

निश्चय ही यह आरंभ किसी मंच-व्यवस्था का विषय नहीं है। प्रारंभ में ही वह स्थल याकि लोकेशन को स्पष्ट कर देते हैं – महोबे के राजप्रसाद का सिंहद्वार। इसके साथ ही हमारे सामने किसी ऐतिहासिक सिनेमा का सेट आ खड़ा होता है। इसके साथ ही लाँग शॉट में हम उस द्वार के बाहर एकत्र होते जन समूह को देखते हैं। इस लाँग शॉट या इस्टैबलिशिंग शॉट के बाद मिड शॉट में हमें स्त्रियों, पुरुषों, बालकों तथा वृद्धों के अलग-अलग दल दिखाए जाते हैं। एक के बाद एक संयोजित इन चार मिड शॉट के ठीक बाद कुछ रिएक्शन शॉट आते हैं, यानी क्लोज अप में विभिन्न चेहरों पर चिन्ता और भय के भाव।

साथ में “हमारी रक्षा होनी चाहिए” तथा “हमको बचाओ” का स्वर भी चलता रहता है। फिर कैमरा ऐंगल याकि कैमरे का कोण बदलता है और हम उसी जन समूह को द्वार पर खड़े प्रहरियों के प्वाइंट ऑफ व्यू (दृष्टिकोण) से देखते हैं। त्रस्त एवं उत्तेजित भीड़ को अपनी तरफ आता देख वे जल्दी से सिंहद्वार के लोह कपाट बंद कर लेते हैं। कैमरा अब फिर मिड शॉट में उन प्रहरियों को अपना स्थान ग्रहण करते दिखाता है जिसके तुरंत बाद उनके ही रिएक्शन शॉट हैं, जिनमें उनकी सजगता को उनकी आँखों के क्लोज अप से दर्शाया जाता है।

वाकई, यह नाटक नहीं, यह पटकथा ही है। एक-सवा मिनट के इस दृश्य में बहुतेरे दृश्यों की भरमार है। इस्टैबलिशिंग शॉट, लाँग शॉट, मिड शॉट, क्लोज अप तथा रिएक्शन शॉट सब के सब इसमें समाए हुए हैं। शॉट का इतना वैविध्य, इतनी विभिन्नता मंच पर संभव ही नहीं, यह सिनेमा में ही संभव है।

पटकथा का यही जादू उनके दूसरे पूर्ण नाटक तुलसीदास में भी देखा जा सकता है। बल्कि यहां तो वह और भी नाटकीयता के साथ सामने आता है। यह नाटकीयता भी प्रकाश एवं ध्वनि से मिलकर बनती है।

पहला दृश्य

(पर्दा उठने के पूर्व गंभीर मेघ गर्जन, दारुण वज्रपात और घोर वर्षा का शब्द सुनाई पड़ता है। पर्दा उठने के बाद भी वह सुनाई पड़ता रहता है । पर्दा धीरे-धीरे उठता है। चारों ओर भाद्रपद की अमावस्या की रात्रि का सूचीभेद्य अंधकार छाया है। कहीं कुछ दिखाई नहीं पड़ता। लहरों के थपेड़ों और हरहराती हुई धारा के शब्द से अनुमान किया जा सकता है कि वर्षा से बढ़ी हुई कोई नदी निकट है। सहसा दिशाओं को कँपा देने वाले गुरुगर्जन के साथ धरती और आकाश को दग्ध-सा करता हुआ बिजली का प्रकाश चारों ओर भर जाता है। उस प्रकाश में यमुना के सैकत तट पर खड़े कुछ झोपड़े दिखाई दे जाते हैं। गर्जन के सकने पर एक झोपड़े से बोलचाल के कुछ स्वर सुनाई पड़ते हैं।)

प्रांरंभ ही किसी दृश्य से न होकर ध्वनि से होता है। पर्दा उठने से पहले ही साउंड इफेक्ट याकि ध्वनि-प्रभाव के जरिये गंभीर मेघ गर्जन, दारुण वज्रपात और घोर वर्षा का सृजन कर दिया जाता है। पर्दा उठ भी जाता है तो आँखे कुछ देख नहीं पातीं, वहां सूचीभेद्य अंधकार छाया रहता है। लहरों के थपेड़ों और हरहराती हुई धारा ध्वनि से बिम्बित होते हैं। ध्वनि प्रभाव से ही यह भी पता चलता है कि निकट कोई नदी है। यहां ध्यान देने की बात है कि कुँवर साहब लहरों के थपेड़ों और हरहराती हुई धारा की ध्वनि या आवाज नहीं लिखते, बल्कि लहरों के थपेड़ों और हरहराती हुई धारा के ‘शब्द’ लिखते हैं।

मुझे अपनी लिखी एक कविता ध्यान हो आती है, शब्द अब अर्थ नहीं, ढोल हैं, थाप दो बजने लगेंगे। गढ़ी हुई ध्यनियां भुनाते हैं लोग खुले बाजार में, शब्द अब अर्थ नहीं, जर्जर अस्थियां हैं, फूंक दो ढहने लगेंगे । गढ़ी हुई ध्वनियां ही तो हैं शब्द। अन्तर बस इतना ही है कि ध्वनियां जहां केवल भाव उत्पन्न करती हैं, वहीं शब्द भाव एवं अर्थ दोनों ही उत्पन्न करते हैं। ‘लहरों के थपेड़ों और हरहराती हुई धारा के शब्द’ लिखते हुए निश्चय ही वह यह जानते रहे कि जिन ध्वनियों का संयोजन वह अपनी रचना के आरंभ में कर रहे हैं, वे न सिर्फ भावोत्पादक हैं, बल्कि अर्थोत्पादक भी हैं। इस छोटे से वर्णन में उनके भीतर का भाषाविद हमें उसी तरह दिख जाता है, जैसे कि बिजली की एक कौंध से यमुना के सैकत तट पर खड़े कुछ झोपड़े।

जब वह लिखते हैं, सहसा दिशाओं को कँपा देने वाले गुरुगर्जन के साथ धरती और आकाश को दग्ध-सा करता हुआ बिजली का प्रकाश चारों ओर भर जाता है तो ध्वनि एवं प्रकाश एक साथ मिलकर एक अन्य दृश्य उद्घाटित कर देते हैं, जिसमें हमें कुछ झोपड़े दीख पड़ जाते हैं। हमें यह भी समझ आता है कि ये झोंपड़े किसी नदी के किनारे हैं। एक क्षण में हम इतना ही देख पाते हैं कि वहां आवास तो है, पर उनका आवासी कौन है, यह रहस्य तब भी कायम ही रहता है। नाटक आगे बढ़ता है, दो व्यक्तियों के वार्तालाप से।

एक स्वर- लगता है, आज तो प्रलय ही हो जायेगी।

दूसरा स्वर- मैं तो जल का ही निवासी हूँ। मैंने भी ऐसी भयानक रात कभी नहीं देखी। (बिजली गरज कर फिर चमक उठती है ।)

पहला स्वर- (आश्चर्य से) कैलाश भैया! वह अद्भुत दृश्य देखो। इस काल रात्रि में कोई दुःसाहसी प्रलय के समुद्र की तरह उमड़ी यमुना की छाती चीरता हुआ चला आ रहा है।

(बिजली का प्रकाश अंतर्हिन हो जाता है ।)

बिजली की कौंध में हमें बतियाती हुई दो छायाओं का आभास हो जाता है और उनकी ही बातचीत से किसी तीसरे की मौजूदगी का भी पता हमें चलता है। मजा यह कि यही तीसरा व्यक्ति इस नाटक का प्रमुख पात्र है, लेकिन उसका परिचय हमें नाटक में आहिस्ता-आहिस्ता ही मिलता है। अपने इस प्रमुख पात्र को दिखाने से पहले ही नाटककार उसके एक गुण से हमारा परिचय करा देता है। हम जान जाते हैं कि वह कोई दुःसाहसी है जो प्रलय के समुद्र की तरह उमड़ी यमुना की छाती चीरता हुआ चला आ रहा है। देखा जाए तो आधुनिक फिल्मों में नायक का प्रवेश कुछ ऐसे ही होता है। अब के सिनेमा में पहले फ्रेम में नायक को न दिखाकर स्थितियों-परिस्थितियों को दिखाकर उसके लिए माहौल बनाया जाता है। ऐमें में यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि कुँवर साहब अपने नाटकों में इस सिनेमाई तत्व का बखूबी इस्तेमाल करते रहे।

बिजली जब अगली बार कौंधती है तो दोनों साथी इस तीसरे की पहचान कर पाते हैं।

(बिजली का तीव्र प्रकाश पुनः फैल जाता है, उसमें एक व्यक्ति तेजी। से आगे बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है। उसे देखकर दोनों चिल्ला उठते हैं। बिजली छिप जाती है ।)

दोनों- ये तो हमारे परम बंधु श्रीवर जी हैं।

पहला स्वर- ठीक कहते हो कैलाश भैया, ये वही हैं ।

भले ही इन दोनों को अब मालूम हो गया कि यमुना की छाती चीरता हुआ चला आ रहा यह व्यक्ति श्रीवर जी हैं, पर दर्शकों के लिए तो यह रहस्य अब भी बना हुआ है कि श्रीवर जी हैं कौन और इस तरह उन्हें आते क्यों दिखाया जा रहा है। इस तरह नाटककार कौतुहल बरकरार रखते हुए नाटकीयता का बखूबी निर्वाह करता है। बिदली जब फिर से कड़ती है, तब दर्शक श्रीवर जी को पहली बार देख पाता है।

(बिजली फिर कौंधती है और वह व्यक्ति फिर दिखाई पड़ जाता है। स्कन्ध विलंबित केशराशि और शरीर के वस्त्र भीगे हैं, चरणों में अदम्य वेग है, और कंठ में अद्भुत संगीत। दोनों दौड़कर उन्हें पकड़ना चाहते हैं। बिजली फिर छिप जाती है। अंधेरा हो जाता है। दोनों अंधकार का वक्ष चीरकर आगे बढ़ने वाले उस पथिक को अधीर होकर पुकारते हैं ।)

श्रीवर जी! श्रीवर जी! इस भयानक रात में आप कहाँ जा रहे हैं? आइए, इस झोपड़े में विश्राम कीजिए।

(कोई उत्तर नहीं मिलता। दोनों मिलकर जोर-जोर से पुकारते हैं। उत्तर देती है हरहराती हुई यमुना, कड़क – कड़क कर टूट पड़ने वाला रौद्ररूप धारी आकाश। सबको प्रतिहत करता हुआ गूँजता है संगीत :- अब लौं नसानी, अब ना नसैहौं।)

यह कुछ सुना-सुनाया सा लगता है। अब लौं नसानी, अब ना नसैहौं – हिन्दी के पाठकों के लिए यह पंक्ति नई नहीं है। यह विनय-पत्रिका में संग्रहित तुलसीदास का प्रसिद्ध पद है। इस तरह दर्शकों को पहले-पहल संकेत मिलता है कि यह नाटक किसी न किसी तरह तुलसीदास से जुड़ा है। पर इसे गानेवाले तुलसीदास ही हैं, यह अब भी उसके लिए सोच पाना कठिन है। रहस्य बना रहता है, कौतुहल कायम रहता है। दोनों मित्रों के लिए तो यह पद नया ही है। वे समझ ही नहीं पाते कि उनका मित्र श्रीवर क्या गा रहा है, और जो वह गा रहा है, वह क्यों गा रहा है।

पहला स्वर- ये क्या गा रहे हैं, भैया कैलाश। ध्यान से सुनकर बताओ।

(बिजली फिर चमकती है। अंधकार को जीतने का संकल्प लेकर आगे बढ़ने वाला वह पथिक गाते-गाते दूर चला जाता है।)

मित्रगण जानना चाहते हैं कि श्रीवरजी गा क्या रहे हैं, तो उन्हें एक और पंक्ति सुनाई देती है या यह कहें कि सुनाई तो पूरा पद ही पड़ता है पर समझ में एक और पंक्ति ही आती है – रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं॥

अब दर्शकों के लिए भी यह समझना मुश्किल नहीं कि राम की कृपा से अंधकार दूर तो हो गया है पर अब भी डंसे जाने का खतरा है और इसीलिए पथिक विनयपूर्वक याचना करता है कि इस कृपा के बाद फिर उसे कोई न डंसे। बात कुछ और स्पष्ट हो सके, उसके पहले ही नाटककार श्रीवरजी को अंधकार में फिर छिपा देता है।

मात्र ध्वनि एवं प्रकाश के संयोजन से कौतुहल का सृजन करना सरल नहीं है, पर कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह यह काम बखूबी कर पाते हैं। उनके नाटकों की यह विशेषता ही उन्हें सामान्य नाटककार से बढ़कर एक विलक्षण पटकथा लेखक के रूप में स्थापित करती है, जिनके नाट्य-लेखन को किसी योग्य एवं पारखी फिल्मकार का इंतजार है।

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